
Hosuui Baekjo
호수의 백조
हीन भावना से बदसूरत कोई एहसास नहीं। एक दादी ने ज़िंदगी भर बेटी की चाह रखी, पर अंत में न बेटी मिली न पोती। उसका पोता, Ho Su-Won, अब काफ़ी हद तक उसी के नाम पर खड़ी एक बैले अकादमी चलाता है। जब परिवार उसके अंतिम संस्कार पर जायदाद बाँटने के लिए जुटता है, तो उसकी छोड़ी असली विरासत से उनका आमना-सामना होता है, वह आख़िरी बेटी जिसे उस औरत ने गढ़ा था जिसने क़सम खाई थी कि अपनी हीन भावना कभी आगे नहीं बढ़ने देगी। वह हीन भावना मरी नहीं; उसने बस एक नया रूप ले लिया है और सब कुछ फिर से शुरू कर दिया है।